बेटियों का हक खत्म? पिता की संपत्ति में अब नहीं मिलेगा अधिकार? जानें नया कानून

बेटियों को भारत में अपने पिता की संपत्ति में विरासत का महत्वपूर्ण कानूनी अधिकार है, जो अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम उन्हें समान हिस्सा देता है, जो विरासत के मामलों में लैंगिक समानता की दिशा में एक प्रगतिशील कदम को दर्शाता है। इस लेख का उद्देश्य एक बेटी के अपने पिता की संपत्ति में अधिकारों का व्यापक अवलोकन प्रदान करना है, जिसमें पैतृक और स्व-अर्जित संपत्ति को संबोधित किया गया है, और इन अधिकारों को कैसे लागू किया जाता है।

पहले, बेटियों को परिवार की पैतृक संपत्ति में कोई अधिकार नहीं दिया जाता था, लेकिन हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में 2005 में संशोधन के बाद, बेटी का अपने पिता की संपत्ति पर अधिकार बेटे के अधिकार के समान ही है। यदि संपत्ति 10 करोड़ रुपये की है, तो बेटे और बेटी दोनों को संपत्ति का समान भाग मिलेगा, यानी प्रत्येक को 5 करोड़ रुपये मिलेंगे। इस लेख में, हम बेटी के अधिकारों के बारे में विस्तार से जानेंगे।

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यह लेख हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की बारीकियों, उन संपत्तियों के प्रकारों का पता लगाएगा जिन पर एक बेटी दावा कर सकती है, नियम के अपवादों और इन अधिकारों का दावा करने में शामिल कानूनी प्रक्रियाओं का पता लगाएगा। यह सर्वोच्च न्यायालय के उन ऐतिहासिक फैसलों पर भी प्रकाश डालता है जिन्होंने वर्तमान कानूनी परिदृश्य को आकार दिया है।

बेटियों के हक: एक नज़र

पहलूविवरण
समान अधिकारहिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत बेटों की तरह बेटियों को भी अपने पिता की संपत्ति में समान अधिकार हैं।
संपत्ति के प्रकारइसमें पैतृक संपत्ति (पूर्वजों से विरासत में मिली संपत्ति) और स्व-अर्जित संपत्ति (पिता द्वारा स्वयं खरीदी गई संपत्ति) शामिल है।
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम2005 में संशोधित, बेटियों को विवाहित स्थिति की परवाह किए बिना, सहदायिक अधिकार प्रदान करता है।
वसीयत अपवादयदि पिता के पास पंजीकृत वसीयत है, तो संपत्ति का वितरण वसीयत में निर्दिष्ट शर्तों के अनुसार होगा, जो हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम को अधिग्रहित करेगा।
उच्चतम न्यायालय के फैसलेस्पष्ट किया कि बेटियों को विरासत का अधिकार है, भले ही उनके पिता की मृत्यु 2005 के संशोधन से पहले हो गई हो।
कानूनी सहाराबेटियां कानूनी चैनलों के माध्यम से अपने अधिकार का दावा कर सकती हैं, खासकर यदि पिता बिना वसीयत के गुजर गए हों। वकील से सलाह लेना उचित है।
लागू होनाहिंदू उत्तराधिकार अधिनियम हिंदुओं, बौद्धों, जैनियों और सिखों पर लागू होता है।
महत्वपूर्ण दस्तावेजसंपत्ति के स्वामित्व के कागजात और पिता का मृत्यु प्रमाण पत्र दावा शुरू करने के लिए आवश्यक हैं।

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम: बेटियों के लिए एक वरदान

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, जो 1956 में अधिनियमित किया गया और 2005 में संशोधित किया गया, भारत में बेटियों के लिए संपत्ति विरासत अधिकारों की आधारशिला के रूप में कार्य करता है। 2005 के संशोधन ने बेटियों को अपने मृत पिता की संपत्ति में बेटों के साथ समान सहदायिक अधिकार प्रदान किए। यह उनकी वैवाहिक स्थिति की परवाह किए बिना लागू होता है।

  • सहदायिक अधिकार: यह बेटियों को संयुक्त परिवार की संपत्ति में जन्मसिद्ध अधिकार प्रदान करता है, जिससे वे सहदायिक बन जाती हैं।
  • समान अधिकार: पैतृक संपत्ति के संबंध में बेटियों के बेटों के समान अधिकार और दायित्व हैं।
  • पूर्वव्यापी प्रभाव: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि 2005 के संशोधन का पूर्वव्यापी प्रभाव है, जो संशोधन से पहले पैदा हुई बेटियों को भी विरासत का अधिकार प्रदान करता है।

संपत्ति के प्रकार: बेटियों का हक कहाँ?

बेटियां दो प्राथमिक प्रकार की संपत्ति पर दावा कर सकती हैं:

  1. स्व-अर्जित संपत्ति: यह पिता द्वारा स्वयं खरीदी गई संपत्ति को संदर्भित करता है। बेटियों का इस संपत्ति पर समान अधिकार है, बशर्ते कि पिता ने वसीयत न छोड़ी हो जिसमें संपत्ति का वितरण अन्यथा हो।
  2. पैतृक संपत्ति: यह वह संपत्ति है जो पिता को उनके पूर्वजों से विरासत में मिली है। बेटियों का पैतृक संपत्ति में जन्मसिद्ध अधिकार है, जिससे वे बेटों के समान अधिकारों के साथ सहदायिक बन जाती हैं।

यदि पिता ने स्वयं संपत्ति खरीदी है, तो बेटियों का उस संपत्ति पर समान अधिकार है। बेटियां उस संपत्ति पर भी दावा कर सकती हैं जो पिता को अपने पूर्वजों से विरासत में मिली है। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम बेटियों को बेटों के समान अधिकार देता है।

वसीयत: एक अपवाद

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम का एक महत्वपूर्ण अपवाद वसीयत की उपस्थिति है। यदि कोई पिता वसीयत का मसौदा तैयार करता है और उसे पंजीकृत करता है, तो उसकी स्व-अर्जित संपत्ति का वितरण वसीयत में निर्दिष्ट शर्तों द्वारा शासित होगा। ऐसे मामलों में, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम लागू नहीं होगा।

उच्चतम न्यायालय के फैसले: बेटियों के हक की पुष्टि

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने बेटियों के अपने पिता की संपत्ति में अधिकारों को आकार देने और स्पष्ट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ऐतिहासिक फैसलों में शामिल हैं:

  • प्रकाश और अन्य बनाम फूलावती और अन्य: सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि 2005 के संशोधन अधिनियम के तहत सहदायिकों के अधिकार 9 सितंबर, 2005 तक जीवित सहदायिकों की जीवित बेटियों पर लागू होते हैं।
  • दानम्मा बनाम अमर सिंह: कोर्ट ने फैसला सुनाया कि अगर पिता, जिनकी मृत्यु 9 सितंबर, 2005 से पहले हो गई, एक सहदायिक थे और एक पुरुष सहदायिक द्वारा विभाजन के संबंध में पहले से कोई मुकदमा लंबित है, तो एक बेटी माता-पिता की संपत्ति के हिस्से की हकदार है।
  • विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा और अन्य: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संशोधन अधिनियम, 2005 की धारा 6(1)(ए) सहदायिक को “निर्बाध विरासत” प्रदान करती है, भले ही संशोधन के दिन पिता जीवित थे या मृत।

इन फैसलों ने सामूहिक रूप से हिंदू संयुक्त परिवारों में बेटियों की स्थिति को समान उत्तराधिकारियों के रूप में सुदृढ़ किया है।

हक क्लेम कैसे करें?

अपने पिता की संपत्ति में अपना उचित हिस्सा प्राप्त करने के लिए, बेटियां निम्नलिखित कानूनी माध्यमों का अनुसरण कर सकती हैं:

  1. परामर्श: विरासत कानून में विशेषज्ञता वाले वकील से परामर्श करना उचित है।
  2. दस्तावेज़: संपत्ति के स्वामित्व के कागजात और पिता के मृत्यु प्रमाण पत्र जैसे सभी आवश्यक दस्तावेज एकत्र करें।
  3. कानूनी कार्रवाई: यदि पिता बिना वसीयत के गुजर गए, तो हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार हिस्सा प्राप्त करने के लिए कानूनी कार्यवाही शुरू की जा सकती है।

याद रखने योग्य महत्वपूर्ण बातें

  • हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम हिंदुओं, बौद्धों, जैनियों और सिखों पर लागू होता है।
  • बेटियों को अपने पिता की संपत्ति में उनकी वैवाहिक स्थिति की परवाह किए बिना समान अधिकार हैं।
  • वसीयत स्व-अर्जित संपत्ति के वितरण के संबंध में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम को अधिग्रहित कर सकती है।

अस्वीकरण: इस लेख में दी गई जानकारी केवल सामान्य सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है और कानूनी सलाह का गठन नहीं करती है। बेटियों के अपने पिता की संपत्ति में अधिकार भारतीय कानून, विशेष रूप से हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत अच्छी तरह से स्थापित हैं। यह धारणा कि एक बेटी का अधिकार “समाप्त” हो गया है, भ्रामक है और वर्तमान कानूनी प्रावधानों पर आधारित नहीं है।

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